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Hymn No. 1566 | Date: 11-Feb-2000
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कुछ नहीं मानता, कुछ नहीं जानता, तेरे सिवाय कुछ नहीं मानता।
कुछ नहीं मानता, कुछ नहीं जानता, तेरे सिवाय कुछ नहीं मानता।
धूल से बना तन घूल में मिला, कहाँ से गया कुछ मेरा।
तन – मन – तन आबध्द है, एक दूजे के है पूरक है, इनसे दूर मैं खड़ा।
दिल में है यार की छवि, कर्मपथ पे बढ़ रहा हूँ ज्ञान ज्योत के सहारे।
देखा जाये तो बहुत कुछ है या कुछ नहीं, मेरा होना ना होने में है तय।
जीतना है ना जीतने के भाव से, भाव की दुनिया से निकल के खो जाना है अभाव में।
गाँव हो या शहर, बरसे कहीं भी कहर, हमको तो मस्त रहना है तेरी मस्ती में।
पस्त होता है तन – मन, तब भी यही कहना है, अस्त होने वालों में से मैं नहीं।
मुझसे चमकता सूरज - चाँद तारा, मैं नहीं सहारे किसीके फिर भी मैं हूँ सहारे उसके।
ना है धमंड भरा उद्घोष, ना हूँ नम्रता की खान, कुछ नहीं को कुछ नहीं का है प्रणाम।
जान – जान जाओगे ये भी तुम, जो हाल है आज हमारा वो हाल होगा इक् दिन तुम्हांरा।
जिसने पीया हाथों से प्यार का जाम उसके, तो हो जाना है किस्सा तमाम।


- डॉ.संतोष सिंह