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Hymn No. 1567 | Date: 11-Feb-2000
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यें। अकाल पुरूष, तू ही तो है त्रिकाल पुरूष ।
यें। अकाल पुरूष, तू ही तो है त्रिकाल पुरूष ।
अज्ञान की दहलीज पे खड़ा, पुकार रहा हूँ संपूर्ण ज्ञान को।
भान नहीं मुझको मेरा, मैं तो पिया हूँ मैं का जाम।
नाम कई बार हुआ, तब भी मिटा तन मेरा।
आज सीखने आया हूँ मिटके ना मिटने की कला।
उबर जाना चाहता हूँ, सबसे रहके संग सबके।
अनोखा ना लगे किसीको, साधारण –सरलता से रहूँ मैं तुझमें।
गुमनाम रहके करता हूँ तेरा नाम, चाहे करूँ कोई भी काम।
फरक ना पड़े चाहे कितना भी हो जाये बेड़ा गर्क मेरा।
अश्क बहे भी तो तेरे प्यार वास्ते, ना ही औरों के वास्ते।
मेरा अपना भी गैर हो गैंर भी अपना व्यवहार में।
मैं तो बना हूँ तेरे वास्ते, जाने ना देना किसी और रास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह