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Hymn No. 1569 | Date: 12-Feb-2000
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धर्म कर्म की देता है हमेशा हूल।
धर्म कर्म की देता है हमेशा हूल।
फिर भी करते रहते है हम भूल।
और प्रभु से कहते है करने को झोल।
विष की डलिया जीवन में लेते है घोल।
प्रभु का न मानके, लेते है मुसीबत मोल।
उसका कराया हुआ, अपना कहके कर्म ले लेते है मोल।
दुःख आने पे चिंता की अग्नि में जाते हें खौल।
सब जानते है कारन, फिर भी सुनना चाहते उसके बोल।
चाहते है कुछ और, बढाते किसी और से मेलजोल।
भार पड़ता है सर पे सबका, तब तेरे आगे पाते नहीं मुँह खोल।


- डॉ.संतोष सिंह