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Hymn No. 1573 | Date: 18-Feb-2000
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कह लेने दे दिल की सारी बात आज तुझसे।
कह लेने दे दिल की सारी बात आज तुझसे।
ना कह पाने से व्यथित हो जाता है मन अपने आप से।
इसी यत्न में रहता हूँ हर पल ले लूँ नाम तेरा।
काम की आँधियों के बीच बढ़ता रहता हूँ तेरी ओर।
मानता हूँ अब तक ना उतरा हूँ नजरों में खरा तेरे।
कुछ भी ना है जग में ऐसा जो विमुख कर दे मुझको तुझसे।
कई बार लड़ा हूँ लड़के थका हूँ हारना कबूल ना है मुझे।
मरने – मारने पे हूँ उतारू तेरा अनंत साम्राज्य पाने वास्ते।
अब भी वही जोश कायम है जो शुरूआत में था मुझमें।
इनायत चाहता हूँ नजरों की तेरी बरपा दूँगा कहर मन पे।


- डॉ.संतोष सिंह