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Hymn No. 1579 | Date: 22-Feb-2000
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अवरूध्द कंठ, गीले नयन, रूठा मन है निशानी सच्चे दिल की।
अवरूध्द कंठ, गीले नयन, रूठा मन है निशानी सच्चे दिल की।
ये तन और मैं का बोध है बस कुछ झूठा, पर प्यार में ना है खोट।
खायी है तन – मान पे कई चोट, उसके बाद भी आना चाहा पास तेरे।
तेरे जितना परिपक्व नहीं इसलिये भुगतता हूँ जुदाई की सजा।
चूर-चूर कर सकता है तू मुझे, पर दूर तू ना है कर सकता।
कितना भी हूँ गया – गुजरा, पर धूल हूँ तेरे चरणों की मैं।
बहुत बड़ी – बड़ी बात ना हूँ करता, पर दिल की बात सुनाता हूँ।
कुछ भी कर लूँ कितना भी, पर दिल रहता है सदा पास तेरे।
तोहमत तुझपे ना हूँ कुछ लगाता, पूर्व के सोहबत का है असर।
निकलने और डूबने की बात ना करके, करूँ हर हाल में प्यार तुझसे।
- डॉ.संतोष सिंह
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