VIEW HYMN

Hymn No. 155 | Date: 28-Apr-1998
Text Size
मालूम नहीं, मालूम नहीं, मालूम नहीं प्रभु तेरे सिवाय हमें कुछ भी मालूम नहीं
मालूम नहीं, मालूम नहीं, मालूम नहीं प्रभु तेरे सिवाय हमें कुछ भी मालूम नहीं
तेरे श्री चरणों की सेवा कैसे करें हम इस जगत में रहके हमें कुछ भी मालूम नहीं
प्रभु हम तुझमें दिल कैसे लगायें इस जगत में रहके हमें कुछ भी मालूम नहीं ।
तुझे पाने के लिये क्या करना है इस रिश्ते को कैसे निभाना है हमें कुछ भी मालूम नहीं ।
तेरे दर पे आने के लिये कहाँ – कहाँ से गुजरना है हमें कुछ भी मालूम नहीं ।
चाहत कैसे बढती है, दिल किसके लिये है धडकता हमें कुछ मालूम नहीं।
तुझपे जादू किसका है चलता, तुझे देखके दिल क्यों है मचलता हमें कुछ मालुम नहीं ।
प्यार को बयाँ कैसे है करना, उम्र का भेद खतम हो जाता है क्युँ हमें कुछ मालूम नहीं
परवाह करनी ना है किसीकी, तेरे लिये मरना रोज – रोज है कैसे हमें कुछ मालूम नहीं ।


- डॉ.संतोष सिंह