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Hymn No. 156 | Date: 22-May-1998
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लेना देना लगा ही रहेगा प्रभु जब आयें है हम इस जग में ;
लेना देना लगा ही रहेगा प्रभु जब आयें है हम इस जग में ;
तुझसे कुछ लेना है तो तेरी चरण रज माँगूँ अपनी माँग सजाने को ।
देना पड़ा कुछ तूझे तो अपनी मन – बुध्दी को दे दूँ, तू जो चाहें वो करूँ मैं;
कैसी शिकवा, कैसी शिकायत अपने कर्मों को कारण तुझसे दूर हुये हम ।
कर्मों का जाल, खुद ही बुनते है, अपने लम्पट में खुद ही फँसते है;
तन के रिश्तों के आगे बैर रखते है दुनियावालों से ।
फिर भी मन के किसी कौने से है, सच्चे दिल की पुकार तेरे लिये,
अपने अस्तित्व को भूल के तेरी शरण में आना चाहता हूँ तेरी चरणों में पड़ा फूल बनना चाहता हूँ ।
तेरी हर बात सर – माथे पे रखना चाहता हूँ हर पल तेरा नाम लेना चाहता हूँ।
मैं तेरा ही था, तेरे ही सहारे तेरा हो के रह जाना चाहता हूँ ।


- डॉ.संतोष सिंह