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Hymn No. 1594 | Date: 03-Mar-2000
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ये तो मेरी आदत है, प्यार में शहादत देनें को रहता हूँ तैयार।
ये तो मेरी आदत है, प्यार में शहादत देनें को रहता हूँ तैयार।
यार माना कि दल में प्यार ने अब तक बना ना पाया है मुकाम।
फिर भी तेरे वास्ते करने को हूँ कुछ भी तैयार तन – मन से।
बता दे कितनी बार काट के चढाऊँ सर को कदमों में तेरे।
औकात से बाहर है कोई काम तो बता दे पर रखना कृपा तू हमपे।
पहले से आखिर है तू मन में मेरे, फिर कहाँ से करूँ कोई और बात।
तू दे या न दे साथ, पर मानता हूँ मेरे हर किये हुये में है तेरा हाथ।
दाद देता हूँ तेरी भी, चुपचाप न जाने कितने घोर कर्मों को सहता है तू।
तेरे लायक मै कहीं से भी नहीं, फिर भी क्या नहीं करता है तू।
अंदाज तेरा है इतना निराला, सदके जाने का है दिल करता।


- डॉ.संतोष सिंह