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Hymn No. 1597 | Date: 04-Mar-2000
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चित्र – विचित्र हालत है मेरी, जान होके हूँ बेजान।
चित्र – विचित्र हालत है मेरी, जान होके हूँ बेजान।
पता है अपनीं इस हालत का राज, फिर भी न आता हूँ बाज।
सजा पायी कई - कई बार, फिर भी गया उस और।
खुद तो खाया धोखा, धोखा खाके सुधर ना पाया।
जिधर भी जाता हूँ, अधर में लटक जाती है जिंदगी।
बंदगी तो करता हूँ, मत पूछो क्या हाल होता है दिल का।
बताना लगता है मुश्किल, फिर भी बयाँ करता हूँ नजरों से।
कंपकंपाते मन को चैन ना मिलता है, मिले बिन तुझसे।
तुझसे बड़ा बेईमान कौन होगा जो हँसके दे देता है इतनी बड़ी सजा।
जान लेना तू भी गुहार ना करुँगा, जोकर हूँ हँसते हुये सह लूँगा।


- डॉ.संतोष सिंह