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Hymn No. 1598 | Date: 04-Mar-2000
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मेरे प्रभु चलती रहती है, उठा – पठक संग तेरे, दिल में मेरे।
मेरे प्रभु चलती रहती है, उठा – पठक संग तेरे, दिल में मेरे।
कभी प्यार में तो कभी अज्ञान में, करता हूँ कोशिश बनने को तेरी जान।
मान तेरा करता नहीं हूँ कम मैं, मुरखता कर बैठता हूँ जानके।
अब तक था बेभान, होश में तो अब आ रहा हूँ, जैसें – जैसें भर रहा हूँ घूंट प्यार का।
नाचीज कितना भी गया गुजरा हो, तेरी अवमानना कर नहीं सकता।
इक कोशिश में रहता हूँ सदा, कैसे भी करके बन जाऊँ मैं तेरा।
ऐसा क्या हुआ है जो मजबूर करता है तू दिल को रोनें के लिये।
झमानां हो गया है जमानें का साया पड़ता नहीं अब मन पे।
सब कुछ छोड़के जोढ़ा है नाता यार हमने तुझसे प्यार से।
घोर करके अघोर होता जा रहा है मन मेरा, तो तू क्यों होता जा रहा है दूर।


- डॉ.संतोष सिंह