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Hymn No. 1599 | Date: 05-Mar-2000
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अनोखा है तू और तेरा संसार बदले प्रतिक्षण रूप अपना।
अनोखा है तू और तेरा संसार बदले प्रतिक्षण रूप अपना।
समय बीता जाये रोके रूका नहीं, अपने अंदाज में रमता रहे तू।
हम जैसे अपलक देखते हुये श्रध्दा से हर्षित होते है मन ही मन।
अपने होने का जुड़के तेरे संग अनचाहे रहस्यो पे से परदा उठते देख रहा हूँ।
जो पढ़ा था किताबों में वो साक्षात नजर आने लगा अब तेरी कृपा से।
जी भरता नहीं अब तुझसे, मिलके भी मिलने को रहता हूँ बेचैन।
दूर हुये है हम अपने कर्मों से, हर भेद मिटाके मिल जाना चाहता हूँ तुझमें।
अजीब हालत हो गयी है मेरी, जब से काल्पनिकता होने लगी सजीव।
इंतजार में हूँ उस क्षण के, जिस क्षण बनेंगे हम एक जान।
मन का है फेर, जिस दिन मिट जायेंगे, तेरे अनंत में हो जायेंगे एक।


- डॉ.संतोष सिंह