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Hymn No. 1601 | Date: 05-Mar-2000
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प्यार के सिवाय न चाहूँ कुछ, प्यार है मेरा आखिरी मुकाम।
प्यार के सिवाय न चाहूँ कुछ, प्यार है मेरा आखिरी मुकाम।
तू ही एक मेरा परम् प्रिय परमेश्वर, न जाना मुझे कहीं और।
हैरानी होती है बात करता हूँ तेरी, कहता हूँ अपने मन की।
सपने बुनता हूँ दिन – रात लेके तुझे, छूट जाते है कर्मों से मेरे।
पता है मिटता जा रहा हूँ हर पल, तेरे प्यार में नया जन्म ले रहा हूँ।
झूठमूठ के कहकहों से परे रहता हूँ निमग्न आनंद में तेरे पास रहके।
पिलाता है जाम नजरों से, सुरूर उतरता नहीं रहूँ चाहे कहीं भी।
प्यार के सिवाय कोई और बात नहीं रहती, नयापन लगता है हर पल इसमें।
रास आता नहीं मन को अब कुछ और, भागता है हर पल तेरी और।
कहने को रहा नहीं अब कुछ, दिन – रात बैठा रहना चाहूँ डाले नजर।
- डॉ.संतोष सिंह
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