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Hymn No. 1604 | Date: 11-Mar-2000
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मिटते हुये देखा संसार को पल – पल में।
मिटते हुये देखा संसार को पल – पल में।
जन्मते हुये को मरते देखा, रूकना न पाया कोई।
सब कुछ जानके, अंजान बना रहा इंसान।
कोई बात ना है ऐसी, जो कह सके कहानी उसकी।
जान – पहचान पैदा कर जाती है मन में हैरानी।
एक ही क्रम – क्रम को क्यों बार – बार हूँ दोहराता।
मोह अटका है चमड़े के थैले में जो छोड़े सदा साथ।
जो नजर न आये ओझल हुआ है कभी न कभी।
गत तो हर स्वरूप की है एक जैसी समझो प्यारे।
कह गये अलग – अलग शब्दों में, सब बात एक ही।


- डॉ.संतोष सिंह