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Hymn No. 1609 | Date: 17-Mar-2000
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हैरां, परेशा होता है दिल, जब तुझको अपने करीब महसूस कर नहीं पाता हूँ।
हैरां, परेशा होता है दिल, जब तुझको अपने करीब महसूस कर नहीं पाता हूँ।
लाग लग गयी है जो तेरी, मिले बगैर तुझसे सुकून मिल पाता नहीं मन को।
आग लगी है सीने में तेरे प्रेम की, पल भर को देर पे भड़क उठती है और।
मन पे चलता नहीं जोर, जब जान जाये मिलने आने वाला है तू।
घायल पंछी की तरह तड़प उठता हूँ, जब जान जाता हूँ तू रूठा है मुझसे।
समझ मेरी जाती रहती है, जब गूँजते है गीत तेरी फिजा में।
रिझाने की ताक में रहता हूँ हर पल, क्या कर दूँ कुछ नया ऐसा।
शायद की कवायद से बचके, तेरा कहा करना चाहता हूँ आँखें मँदके।
मन में नाचै कोई और मोर, पर दिल की डोर से बाँधे रखना चाहता हूँ तुझे।
तेरा हाथ पकड़के भाग जाना चाहता हूँ, दुनिया से बहुत दूर पकड़ न पाये कोई और।


- डॉ.संतोष सिंह