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Hymn No. 1610 | Date: 17-Mar-2000
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इतना भी ना रह तू बेख्याली में, होता रहे कत्ल सरेआम दिल का।
इतना भी ना रह तू बेख्याली में, होता रहे कत्ल सरेआम दिल का।
मगन होके अपने में तू ढाता रहे, सितम् पे सितमार के दिल पे।
उलफत् में पड़ जाते है हम, जब तू पूछ बैठता है कब – कैसे – क्यों हुआ।
खाकसार तड़प के रह जाता है जानके अंजान जब बनता है तू।
खेल – खेलना आदत है तेरी या भोलापन समझ नहीं आता है कुछ।
जो भी हो तेरे इस अंदाज पे प्यार आता है हमको, नहीं तो सताता है दिल को।
हमे पता है जब प्यार करते है तो प्यार करते है पर बेवफा बनने से चूकते नहीं।
तेरी ओर से बेवफाई का जवाब प्यार में पाया, बता दे कहा से इतना निर्मल दिल तू ले आया।
कत्ल करना पड़ा तन – मन का, तो कर देंगे तेरे वास्ते अपने हाथों जरूर।
पर तेरा प्यार पाने के लिये खुद को बदलना पड़ा तो बदलेंगे जरूर।
- डॉ.संतोष सिंह
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हैरां, परेशा होता है दिल, जब तुझको अपने करीब महसूस कर नहीं पाता हूँ।
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