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Hymn No. 1612 | Date: 19-Mar-2000
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ऐ न्याय प्रिय क्यों करता है तू मेरे संग अन्याय।
ऐ न्याय प्रिय क्यों करता है तू मेरे संग अन्याय।
अपने खेल के लिये जन्मा के मारे इस धरा पे बार – बार।
दोष दे देता है हमारे कर्मों को, अपना अकेलापन् दूर करने के वास्ते।
यहाँ – वहाँ भटकते है तेरा नाम ले लेके, फिर भी करार दे देता है झूठा।
मनाते है हर बार तुझे – भुलाके सब कुछ, फिर भी रहता है रूठा।
अगर खोट है हममें तो आयी, खोट तेरी दुनिया से।
आता है जब भी लेके अकुत सामर्थ्य समझाने अपने कपूत को।
वाह रे तेरी लीला कहता है तू आँख मुदकें रहनें को आनंद में।
ले ले तू मेरी कितनी भी कठिन परीक्षा लेना ना किसी और की।
हंसते हुये निकल जायेगे इम्तिहाँ के इस दौर, से जो कर देती है कमजोर।


- डॉ.संतोष सिंह