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Hymn No. 1613 | Date: 20-Mar-2000
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आज कैसे छोड़ पाऊँगा जमके गुलाल तेरे रोमं – रोमं में।
आज कैसे छोड़ पाऊँगा जमके गुलाल तेरे रोमं – रोमं में।
होनां ना तू नाराज, किया है कितना इंतजार न जाने कितने कालों से।
दावा है मेरा उतारें – उतरेंगा ना रंग, मीलाया है जो प्यार इसमें।
रंगते – रंगते बन जाऊँगा खुद भी प्यार का रंग, तुझसे लिपटनें के वास्ते।
झलकेंगी तेरी छवी मेरे मुख पे, खेलते – खेलते होली खो जाउ@ंगा तुझमें।
अलग – अलग रूप पे चढेंगा प्यार का रंग, हो जाऊँगा माफिक तेरे।
हर दिन होंगी तब होली – दिवाली, करनां ना पड़ेगा इंतजार कोई विशेष दिन का।
वस्ती का आलम होंगा, बैरंग मौसंम में भी चढा रहेगा प्यार का रंग।
लाल होने के वास्ते जरूरत ना होगी गुलाल की, याद आते ही चढेगा रंग प्यार का।
सारी सीमाये तोड़ दूँगा तन – मन की, तेरे रंग में रंग जाने के लिये।
- डॉ.संतोष सिंह
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