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Hymn No. 1615 | Date: 22-Mar-2000
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हाल बड़ा खराब है मन का, समझके भी ना समझने को है तैयार।
हाल बड़ा खराब है मन का, समझके भी ना समझने को है तैयार।
कुछ भी करके वो मशरूफ रहना चाहता है यार के प्यार में।
सिलसिला चलता रहता है तो ठीक है, टूटने पे हो जाती है हालत विक्षिप्तों जैसी।
कुछ भी करके हो जाना चाहता है तेरा, कैसे भी करके करना चाहता हूँ कहा हुआ तेरा।
दिया है तूने आशीष से भरा सामर्थ्य, फिर भी कैंसे कर जाता हूँ चूक।
जीवन के हर पलों की लड़ियों को गूँथ देना चाहता हूँ प्यार के संग तेरे।
करना होता जा रहा है मुश्किल, कुछ भी करना लगता है दूर होना तुझसे।
मेरे प्यार में है जरूर कोई बड़ी खामी, जो अब तक बेखबर है मेरे प्यार से तू।
फिर भी ना छोडूँगा पीछा तेरा, तू ना मिला तो तेरे बनाये हुये को देखके याद करुँगा तुझे।
तू चाहे या न चाहे तेरे पीछे होम कर दूँगा अपने जीवन को।


- डॉ.संतोष सिंह