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Hymn No. 158 | Date: 23-May-1998
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हैरान हो जाते है हम कभी – कभी तेरी दरियादिली पे ;
हैरान हो जाते है हम कभी – कभी तेरी दरियादिली पे ;
अपने दुःखों के लिये दोष देते है तूझे, फिर भी तू करता है मदद ।
सुख में भूल जाते है तूझे, मैंने किया – मैंने किया जपते है हम;
इतना सब कुछ देखने सुनने के बाद भी माफ कर देता है तू हमें ।
तुझसे बड़ा कौन है दयालु इस जग में, जो भी दिया तूने दिया सबको ;
जिसने तुझको माना, जिसने तुझको न माना, सबको क्यों कि हिसाब से तूने दिया ।
तेरा नाम ले के करते है हम सब कुछ, दे देते है हम अपने पुरखों का नाम ;
तेरे दर पे आते हैं गिडगिडाते हुये, तुझसे ही भीख माँगते है, जग के सामने नाम अपना करते है।
तन छुटने पे अपने कर्मो की सजा से बचने के लिये नीच योनियों में जीते है ।
अपने जैसों में करते हें निवास; खुदा और खुदा के बंदो से दूर रहते है ।


- डॉ.संतोष सिंह