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Hymn No. 1622 | Date: 24-Mar-2000
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मेरे प्रभु मुझे मालूम है काबिल नहीं प्यार के तेरे।
मेरे प्रभु मुझे मालूम है काबिल नहीं प्यार के तेरे।
झूठा हूँ मैं, झूंठ से बिधा है मेरे तन का रोम – रोम।
धोखा है मेरे आँसू, आ जाये शरम् घड़ियाल को भी।
किया है सौदा मन का, कई - कई बार कामनाओं के साथ।
छूटा नहीं है पीछा मेरा, इच्छाओं की परीघों का दामन हूँ पकड़ा।
देंखके कह उठेगा कोई भी, सर से पैर तक जकड़ा हूँ मोह में।
राह रोके खड़ी है, जग भरके वासनाओं के ज्वार ने।
खुद से खार खाये बैठा हूँ, खुदा कैसे करुँगा प्यार तुझसे।
सब कुछ है धोखा मेरा, ऐ प्रेम के परम् शहंशाह।
पर कुछ भी ना कहना मेरे प्यार को, जो हाँ कर बैठा हूँ तुझसे।
हाँ उढ़ा लो मजाक मेरा, ढकेल दो गर्त के सागर में।
मैं लायक हूँ घृणा के, अनंत दुःखों का दे देना साम्राज्य
तन के रोम – रोम पे देना दुनिया भर की चोट तू।
तड़पूँ ऐसा तड़प भी जाये देंखके मेरी तड़प।
फिर भी ना तु मुझे छोड़ना, चलाना सिलसिला अनंत काल तक।
छोड़ दें सब मेरा साथ, पर बनाये रखना जान तू मुझमें।
मौका मिलेगा सजा तुझे देने का, हाँ जुड़ने ना देना नाम किसीसे मेरा।
हाँ गुजारिश है इक् और, हर सजा पे याद कर लेने देना दिल को तुझे।


- डॉ.संतोष सिंह