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Hymn No. 1627 | Date: 28-Mar-2000
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कितनी अजीब बात है प्रभु एक ही घर में रहते है हम और तू।
कितनी अजीब बात है प्रभु एक ही घर में रहते है हम और तू।
संग रहके भी कितना भेद है हममें – तुममें, ये जानता है तू।
एक ही चित्त है जिसमें रहता है तेरा निर्मल प्रेम और मेरा द्वेष।
तू है श्रध्दा का स्वामी और मैं मन के कुभावों का दास।
संसार की हर वस्तुओं का पड़ता मुझपे प्रभाव, रहके संग रहता है तू मुक्त सबसे।
कई बार सिखलाता है तू, हाथ पकड़के आगे की और ले चलता।
फिर भी गड़बड़ कर जाते, ऐ माया के स्वामी माया के दास बन जाते हम।
तू सबको हँसी आनंद में रहके, आनंदित करता तू, दर्द - गमों के मारे हुये को।
ये भी कम नहीं, रहते है साथ तेरे, लोभ – ईर्ष्याओं का दर्शाते क्रोध भी।
काम का मतवाला, गत बनाती इच्छायें देके थपेड़े विनाश के।
इक् तरफ तू है, इक तरफ कर्म मेरे बीच में, मार खाता बिचारा तन।
बँधा हूँ इसमें तो हर दर्द - गम के दरिया को पड़ता सहना, तो क्या कहूँ तुझको।
- डॉ.संतोष सिंह
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