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Hymn No. 1629 | Date: 29-Mar-2000
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आवारा बादल को डौर है सागर में, पंक्षी का घर है शाख पे।
आवारा बादल को डौर है सागर में, पंक्षी का घर है शाख पे।
प्रभु इस अनंत जगत का भी ओर – छोर है तेरी प्यारी गोद में।
उन्मुक्त पवन का ठौर है घटाओं के बीच, आधार है धरा पे ऊँचे परबतों का।
प्रभु तेरी बनायी हर कल का जुड़ाव है किसी ना किसी से।
गति की भी सीमा है रूकने में, सूरज की किरन को मिलता है।
प्रभु सुबह का निकला हर जीव पहुँचता है साँझ ढलें अपने घर को।
नदी की पहुँच है किनारो तक, अंजाने राह पे चलने वाले प्रत्येक पहुँचे मंजिल को।
प्रभु तय कर रखा है तूने हर किसी का कहीं ना कहीं निश्चित स्थान।
जीवन का अंत है मौत में, हर करमों का फल है धरम में।
प्रभु रूँधे गले से पूछ रहा है आलसी, क्या मेरे आलस का भी अंत है।
- डॉ.संतोष सिंह
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