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Hymn No. 1634 | Date: 31-Mar-2000
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मुश्किल में पड़ गया प्रभु भी, कहाँ से पड़ गया पाला इस ऐड़े से।
मुश्किल में पड़ गया प्रभु भी, कहाँ से पड़ गया पाला इस ऐड़े से।
नासमझदारों को समझदार बना दूँ, पर ये ऐड़ा न खाने पे तुला है समझदारी का पेड़ा।
पार कराया प्रेमियों को प्यार का जाम पीलाके, कैसे पार पाऊँगा मैं इससे।
पशोपश में पड़ गये प्रभु मन ही मन में, दोहराया जो भी होगा अच्छा होगा।
ऐड़े की दिल में जागी चिंगारी सोच की, क्यों मेरी प्रिय की आँखें हुयी नम।
गोता लगाया प्रभु कृपा सागर में, मस्ती के मौजों बीच अकेला पत्थर खड़ा देखा।
सोचके शरमाया, राक्षसों ने निभायी थी दुश्मनी प्रभु के आमने – सामने रहके।
मैंने तो किया है बहुत बड़ा द्रोह, संग प्रियतम के रहके छुरा भौंका दिल में।
ग्लानि से भर गया ऐढ़ा इतना, काटो तो खून नहीं प्राण हुआ फुर्र।
क्या इस बार भी वहीं कथा दोहराऊँगा, फिर से दुनिया का घृणित पुरूष बनके जीऊँगा।
दोष ना है इसमें प्रभु तेरा, हमने जोर चलने दिया सदा से प्रारब्ध का।
पर अब ना दोहराने दूँगा वो खेल, ऐढ़ा खुदको मिटके करेगा नाम तेरा।


- डॉ.संतोष सिंह