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Hymn No. 1636 | Date: 01-Apr-2000
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नाद उठता है मेरे भीतर से तेरे नाम का।
नाद उठता है मेरे भीतर से तेरे नाम का।
गूँज होती है उसकी, तन – मन के ओर – छोर तक।
हवा हो जाते है सारे विचार, रह न पाऊँ आपे में।
उमड़ता है प्यार का ज्वार, उमड़ने से रोक न पाऊँ।
अनायास ही हो जाती है खत्म जीवन की सारी माँगें।
मगन होके नाचता फिरता हूँ तेरे आँगन में।
सीमा मेरी नहीं रहती, हद में मेरे क्या नहीं रहता।
मतलब नहीं है शब्दों का, मतलब नहीं कुछ करने का।
प्यार मैंने ना किया किसीसे, ये तो हो गया अपने आप से।
उलझती गुत्थी सुलझ गयी प्रभु तेरे प्यार में।


- डॉ.संतोष सिंह