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Hymn No. 1638 | Date: 01-Apr-2000
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ऐ मेरे चितचोर, दे झकझोर मेंरे मन को।
ऐ मेरे चितचोर, दे झकझोर मेंरे मन को।
थोर है वहाँ चलता है जोर वो तन पे।
रहता है हर पल डूबा इच्छाओं के शोर – शराबे में।
हो जाती है खूँखार, जब पूरी न हो पाये कामनायें।
काटो तो खून नहीं, जब कर जाये तन-मन कोई करम।
ऊपर उठ जाना चाहता हूँ अच्छे – बुरे के खेल से।
अब ना है भोगना रहके इस तन – मन के जेल में।
अलग हुआ न जाने क्यों, अब जुड़ जाना चाहूँ प्यार से।
यार मैं कोई कायर नहीं, जो खेले दुनिया की अबूझ शक्तियाँ मेरे संग।
देख तू मेरी आँखों में झलक पायेगा तेरी, ये खुदा जोर चलेगा।


- डॉ.संतोष सिंह