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Hymn No. 1642 | Date: 03-Apr-2000
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ऐसा – कैसे हो सकता है, जब याद न आयें प्रिय की।
ऐसा – कैसे हो सकता है, जब याद न आयें प्रिय की।
फरक ना पड़ता है प्रिय को, दिन – रात जलता है दिल।
मानां सरोकार ना किया कभी, अपना अनुपम प्यार दिया हमकों।
दाग था दामन में हमारे, जो मेल हो न पाया अब तक तुझसे।
इसका मतलब ये न था, हम डूब जायें अँधेरे गर्तों में।
सारी शर्त तेरी करता हूँ मंजूर, फिर भी हो जाता हूँ दूर।
मत छोड़ तू हमको हमारे हाल पे, हम तो ना हुये है खुदके।
जितना जुदा रखेगा तू, बदल जायेगे हम जीवित लाश में।
माया के पाश से छुड़ाके, जकड़ लें हमको तू तेरे प्रेम में।
क्या अब तक दिल नें इक् बार भी ना किया है अनुरोध सच्चे प्यार का।


- डॉ.संतोष सिंह