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Hymn No. 162 | Date: 27-May-1998
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ना तुम उसे प्रणाम करते हो, ना ही उसका तुम ध्यान करते हो, और चाहते हो हर पल रहे मदद को तैयार तुम्हारी ।
ना तुम उसे प्रणाम करते हो, ना ही उसका तुम ध्यान करते हो, और चाहते हो हर पल रहे मदद को तैयार तुम्हारी ।
तुम उसको मानते भी नहीं हो, ना ही उसकी परवाह करते हो, और चाहते हो यूँ ही तुम्हारी झोली भरता रहे ।
कुछ अच्छा कर्म हो जाता हैं तुम्हारे हाथों, तो जग भर में ढिंढोरा पिटते फिरते हो, मैंने किया, मैंने किया।
थोड़ा सा कुछ गलत हो जाता है तो कहते हो ईश्वर को मंजूर न था
अपनी हर कमी को उसका नाम लेके छुपाते फिरते हो, फिर ये भी कहते हो हमारे धर्म में तो ऐसा था।
धर्म के नाम पे अपने भाईयों से लड लेते है, अपनों का खून बहाते – फिरते है ।
तुम्हारे मानने में भेद सकता है, तुम्हारी प्रार्थना के तरीके अलग – अलग हो सकते है,
उस खुदा के स्थान का नाम बदल सकते हो ।
पर वो एक है, एक था, एक ही रहेगा तुम्हारे जैसे कितने पागल पुत्र आके चले जायेगे पर वो सदा रहेगा ।
बदलोगे तूम; बदलेगी तुम्हारी रीत – रीवाज, तूम्हारी यात्रा तो उसके दर से शुरू हुयी है,
मंदिर – मस्जिद तो रास्ते के पड़ाव हैं ।
धर्म तो भरम तोड़ने के लिये है, दिलों से जोडने के लिये है ।
हर सुबह अपनी अधूरी यात्रा करनी पड़ेगी शुरू जब तक मंजिल पे पहुँच ना जाओ और जब मंजिल, तो उसका दर ही है ।
तब अपनी हर भूल पे पछताओगे कदमों में उसके बैठके आँसू बहाओगे, बड़ा दिलदार है वो सब भूल के तुमको गले लगायेगा ।


- डॉ.संतोष सिंह