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Hymn No. 163 | Date: 28-May-1998
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इंतजार है मुझे उस दिन का जब तेरी बारात आयेगी मेरे दर पे ;
इंतजार है मुझे उस दिन का जब तेरी बारात आयेगी मेरे दर पे ;
खुश होता हूँ यह सोचके चार कंधों पे हो सवार जाऊँगा तेरे धर को ।
छूटेगा हर रिश्ता - नाता, टूटेगी हर मोह – माया, हर बंधन को तोड़के;
तन – मन को छोडके, जा पहुँचुँगा तेरे दर पे, तुझसे ही तो मेरा हर रिश्ता – नाता है ।
मेरी सौत थी तेरी माया जिसके कारण तेरा दर छूटा था सदियों पहले;
मूक दर्शक तू बना रहा, मैं माया का शिकार होता रहा, कर्मों के बाणों से।
आज भी कोई शिकवा – शिकायत ना है तुझसे, तेरी गुलामी में है मेरी सच्ची आजादी ;
तुझसे दूर रहके बहुत बरबाद हो लिया, आबाद होने के दिन आ गये तेरे करीब आते ही ।
धरम - करम के बंधन को छोडके, मैं बाँधुँगा तुझको अपने प्यार के बंधन में;
इसी बंधन में बंध के, लेकें आयेगा बारात तू मेरे दर पे ।


- डॉ.संतोष सिंह