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Hymn No. 164 | Date: 29-May-1998
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लुटा दूँ, लुटा दूँ, लुटा दूँ मैं अपना सब कुछ तुझपे लुटा दूँ;
लुटा दूँ, लुटा दूँ, लुटा दूँ मैं अपना सब कुछ तुझपे लुटा दूँ;
तेरी एक मुस्कान पे मैं अपना सब कुछ लुटा दूँ ।
जीवन लुटा दूँ अगर तेरे चरणों में बैठने को मिले एक पल ;
तुझको अपना बनाने के लिये, जो कई जन्मों में पाया, वो सब कुछ लुटा दूँ ।
वो सब कुछ जो मैंने माँगा – माँगके तुझसे अपने जीवन में पाया तुझपे लुटा दूँ ;
क्षण मात्र के लिये तू नजर भरके मेरी नजरों में झाँक लें मैं अपना सब कुछ लुटा दूँ ।
तेरे परम प्रिय भक्तों का संग मिल जाय तो मैं अपना सब कुछ लुटा दूँ ;
तेरे यादों में मैं लुटाता चलूँ, बस लुटाने का अहसास ना हो मुझे, मैं सब कुछ लुटा दूँ ।
हर मेरी वो बात जो तुझसे कहने के लिये सोच रखी है मैंने, तो तुझपे सब कुछ लुटा दूँ;
लुटाते, लुटाते मैं यूँ ही खुद को तुझपे लुटा दूँ ।


- डॉ.संतोष सिंह