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Hymn No. 165 | Date: 30-May-1998
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अनायास मेरा मन क्यों भटक जाता है, रह रहके प्रभु क्यों तुझसे दूर हो जाता हूँ ।
अनायास मेरा मन क्यों भटक जाता है, रह रहके प्रभु क्यों तुझसे दूर हो जाता हूँ ।
मैं तो रहता हूँ, तेरे ख्यालों में डूबा, फिर कोई और क्यों हो जाता है मुझपे हावी ।
तेरे करीब रहते हुये मैं इतना कमजोर क्यों हूँ, मेरी इच्छायें इतनी मजबूत कैसे है ।
सच कहता हूँ, प्रभु मेरा दम घुटता है, जब में जीता हूँ अपनी इच्छाओं के संग ।
उस पल मेरा रोम – रोम तडपता है, जब मैं कैद हो जाता हूँ अपनी इच्छाओं के साथ ।
क्यों प्रभु मेरी सच्ची चाह क्यों है इतनी बेअसर, क्या मेरा अंतरमन भी झूठा है ?
रोता हूँ मैं जार – जार तेरे लिये, फिर भी आँसू नहीं गिरते, क्या मेरी तडप सच्ची नहीं है ?
आज तू प्रभु सच – सच बता दे मुझे, सारी कमियाँ मुझमें ही क्यों, क्या मैं तेरे लायक नही ?
बुरा शब्द सिर्फ न रह जाय शब्दकोश में, इस जगत में क्या तूने मुझको उसका पर्याय है बनाया ?
अच्छे अच्छे गुणों से तूने दुनिया को है सजाया ; दुर्गुणों के लिये तूने क्या मुझको ही चुना था ।
मुझको कोई शिकवा – शिकायत ना है तुझसे, तेरी चाहत में मेरी किस्मत है ।
बातें करने के लिये बैठा था तेरे सामने, बहक के यूँ ही कुछ कह गया तुझसे ।
तेरी इनायत क्या कम है मुझपे, तेरे किसी काम में कुछ तो आ सका ।


- डॉ.संतोष सिंह