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Hymn No. 1686 | Date: 25-Apr-2000
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ऐ क्या होता जा रहा है, जैंसे – जैंसे बढ़ रहा हूँ और तेरे।
ऐ क्या होता जा रहा है, जैंसे – जैंसे बढ़ रहा हूँ और तेरे।

सताने लगता है मुझे मेरा डर, जो घर कर चुका है मन में मेरे।

शांत दिल सह लेता है चुपचाप, मन के अबूझ घोर कर्मों को।

जोर चलता ना है मेरा, जब पड़ता है उसका दौर तन पे मेरे।

करना कुछ और चाहता हूँ, कर बैठंता हूँ बहपे उसमें कुछ और।

घड़ी भर बाद सम्भाले नहीं सम्भलता, फँस जाता हूँ दलदल मैं।

बल जो बचापे रखा भक्ति के वास्ते, खप जाते है किसी और रास्ते पे चलके।

दया का स्वामी है तू, कर कृपा इतनी उबर जाऊँ सबसे तेरे वास्ते।

मुझे ना है मंजूर तेरे सिवाय कुछ और, चाहे कहे कितना भी मन मेरा।

ये कैसा भी हूँ, आया हूँ जग में सिर्फ तेरे वास्ते ना ही कोई के वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह