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Hymn No. 1703 | Date: 28-Apr-2000
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मेरी आँखों के डोरे क्यों लाल है, तो कहूँगा तरबतर है तेरे प्यार में।
मेरी आँखों के डोरे क्यों लाल है, तो कहूँगा तरबतर है तेरे प्यार में।
मुझपे छायी रहती है ये कैसी मस्ती, कहूँगा मैं तो सँवार हूँ प्यार की किश्ती पे।
मेरे कदम क्यों लड़खड़ा रहे है, तो कहूँगा हो चुँका हूँ बाँवरा प्यार में।
जुबाँ से शब्द निकलते है क्यों अजीब से, कहना होता है कुछ कहते है कुछ प्यार का रोग हें अजीब।
मेरा डर गया कहाँ, तो कहूँगा रहता नहीं भान वीरांना हो या भीड़।
बूँद – बूँद करकें बरसती है क्यों आँखें, इंतजार का लंबा सिला मिलता है जब।
कैंसे बताऊँ क्या ना गुजरती है दिल पे, कसम से बस गजब ही होता है।
इतना भी ना रहता दम – दम होके बेदमों जैसी हालत रहती है हमारी।
क्या ना बनती है तेरे प्यार में, स्वद्योणित इस बगुले भगत की।
उबार ले तू मुझे इन सब बातों से, बस डूब जाने दे प्यार में तेरे।


- डॉ.संतोष सिंह