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Hymn No. 1706 | Date: 29-Apr-2000
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मुझे मालूम नहीं क्या - क्या रस्में है प्यार की।
मुझे मालूम नहीं क्या - क्या रस्में है प्यार की।
हाँ हूँ तैयार निभाने को, चाहे होना पड़े कूर्बान।
छाया है नशा प्यार का, उतारे उतरता नहीं।
रहता हूँ हर पल खोया खोया, जब तक यार से मिलता नहीं।
खोल के रख देना चाहता हूँ, दिल अपना यार के आगे।
देख ले, ना है तेरे प्यार के सिवाय कुछ यहाँ।
कहता है कभी मगरूर बनके, जहाँ जाऊँगा खींच लाऊँगा तुझे।
सनम लिया है जनम तेरे वास्ते, मौका हाथ से न जाने दूँगा।
गुजरनां होगा कदम हमारे दिल पे से रखके।
सहेजूँगा चरणों को तेरे, चुभ न जाये कोई काँटा मन का।
मतवाला बनके फिरूँगा यहाँ – वहाँ जहाँ हो आसरा तेरा।
सजदा करूँगा दिल से दिन – रात, तन का न होगा कोई तौर – तरीका।


- डॉ.संतोष सिंह