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Hymn No. 1707 | Date: 29-Apr-2000
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कब तक चलेंगा खेल लुका-छिपी का, ढुँढ़े बिना ना लेंगे दम।
कब तक चलेंगा खेल लुका-छिपी का, ढुँढ़े बिना ना लेंगे दम।
हारेगा तन कोई बात नहीं, बिन् ढुंढ़े दिल हार मानेगा नहीं।
सितम् जो भी ढायेगा यार, सह जायेगे प्यार के नाम पे।
दाग कितना भी है दामन में, घुल जायेगे विरह में उपजे आँसूओं में।
उपहास उढ़ाओं मेरा कितना भी, पर ना उढ़ाओं दिलवाले मेरे प्यार का।
कर जाती है आग में घी का काम, तुम्हारें फिकरें मेरे वास्ते।
सच पूछो तो हम ने ना कभी सोचा था, होंगे शिकार हम प्यार के।
सहने को हूँ तैयार सारी जहालत, यार तेरे प्यार के वास्ते।
माना तुझपे कुर्बान होने के वास्ते तैयार एक से एक हीरे।
हम तो प्यार की मस्ती में बनके धूल, चूमना चाहते है चरणो को तेरे।
- डॉ.संतोष सिंह
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