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Hymn No. 167 | Date: 02-Jun-1998
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ऐ मेरे परम् पिता बना दे मुझे तेरी अबोध संतान;
ऐ मेरे परम् पिता बना दे मुझे तेरी अबोध संतान;
मुझे ना बोध करना है कौन मेरा माता – पिता, किससे मेरा क्या रिश्ता – नाता ।
तेरी अँगुली पकडके इस जग के डगर पे चलना चाहूँ;
कभी तेरे आगे नाचूँ, कभी तुझको पकडके झूमना चाहूँ ।
तेरे साथ यूँ ही चलते - चलते तुझसे आंगे बढ़ जाऊँ;
आगे जाके तेरी आहट न पाऊँ, तो घुमके – दौडके तेरे कदमों से चिपट जाऊँ ।
अपनी तोतली बोली से ढेर सारी बातें तुझे सुनाऊँ मैं;
तू कुछ बोलना चाहे मुझसे, तेरी बातें खत्म होने से पहले मैं सब कुछ कहना चाहूँ ।
गलबहियाँ बनाके झूलूँ मैं ; झूलते – झूलते तुझको चूँम लूँ मैं ;
ना ही भूख मुझको तुझसे जुदा कर सकें, नींद में भी तेरे सीने से चिपट के सो जाऊँ ।


- डॉ.संतोष सिंह