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Hymn No. 168 | Date: 04-Jun-1998
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क्यों उलझाते रहते है अपने आप को और प्यारी सी जिंदगी को;
क्यों उलझाते रहते है अपने आप को और प्यारी सी जिंदगी को;
सुलझा ना सको इस जीवन को, उलझाने से तो बच सकते हो ।
क्यों खोये रहते हो अपनी अपूर्ण इच्छाओं में ;
भागते रहते हो हर पल मन के पीछे, तन के अनुकूलताओं के लिये ।
खेल है ये सब माया का, जो साया की तरह पीछे रहते है हमारे,
संतुष्ट जब एक से ना हुये तो अनेक से क्या होगे ।
दगा हर बार खाये फिर भी बाज न आये आदतों के चक्कर में,
शहादत देनी पड़ती है अपने अबूझ कामनाओं की ।
सब कुछ बस में ना है हमारे, माँ बनके करने चला उतना ही फसते गये,
प्रभु की शरण लेनी पड़ती है निश्चल दिल से, बचने के लिये इन सबसे ।


- डॉ.संतोष सिंह