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Hymn No. 1720 | Date: 03-May-2000
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आया है इक् छलियाँ बदलकें, रूप अपना।
आया है इक् छलियाँ बदलकें, रूप अपना।
विपरीत है वो दुनिया से, रहके दुनिया में।
हृदय उसका है करूणा का दरिया, बरसाये कृपा आँखों से।
चुपचाप पी जाता है दूजो का दर्द, उफ् तक ना है करता।
अमोघ है उसकी वांणी, मजबूर करती भूलने को सब कुछ।
कैसे बताऊँ उस लघु रूप में आया है जगत नियन्ता।
क्या न करता हमारे वास्ते, फिर भी ना कर दिखाते कहा उसका।
भरना चाहता है झोली हमारी, शाश्वत् आनंद से।
फिर भी निर्लज्जता से गिड़गिढ़ा के माँगते है कुछ और।
अरे जाओ – जाओ, फिर न पाओगे न जाने किस कारण से मिला साथ उसका।


- डॉ.संतोष सिंह