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Hymn No. 1721 | Date: 03-May-2000
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ऐसा कोई भी ना पल है, जब कह सके कोई मैं अलग हूँ तुझसे।
ऐसा कोई भी ना पल है, जब कह सके कोई मैं अलग हूँ तुझसे।
हमने पिया है अमृत जिसने छुआ है तेरे लबों को।
हमारे विश्वास को तूने सींचा है अपने प्यार से।
कयामत आ जाये तो क्या से, मिट ना सकती छाप दिल से।
हुआ है गुलजार जीवन, प्रियतम की अनुपम कृपा से।
मिटेंगा कैंसे मन पे से, वो तो खो चुका है यादों में तेरी।
दाद देनी पड़ेगी, जो भाग्य में न था वो जोड़ दिया तूने।
प्यार का सिलसिला खत्म होने को है, अब तो वक्त आ गया परिणीती का।
दिल दे रहा है दस्तक तेरे दरबार में बार – बार तेरा होने का।
मेरा रूप भी धीरे – धीरे ढल रहा है तेरे स्वरूप में बदल जाने के वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह