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Hymn No. 1733 | Date: 07-May-2000
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जीवन में आते है पल अनेकों तरह – तरह के।
जीवन में आते है पल अनेकों तरह – तरह के।
कितना भी कर लो रूकता नहीं कोई, गुजरते है पलक झपकते।
अजीब बात है जानते सभी, मानता है कोई एक।
इक बार नहीं कई - कई बार, दोहराया जाता है जीवन में ये खेल।
जीतने की रखता ना कोई इच्छा, क्योंकि छूट जाता है सबसे पीछा।
मजा आता है हम सबको, रब के इस खेल में।
जिसने जाना करके यत्न, पहुँचा परम् पिता के पास।
भेज दे मेरे तू तारनहार, सद्गुरू के पास।
मायाजाल से पीछा छुड़ा ना सकते प्रभु, तोड़ता है इसको सद्गुरू।
हमारे यत्नों पे अपनी कृपा बरसाके, तोड़ता है इस मायाजाल को।


- डॉ.संतोष सिंह