VIEW HYMN

Hymn No. 170 | Date: 06-Jun-1998
Text Size
ऐ मेरे परम पिता नाराज मत हो तू हमपे इतना ;
ऐ मेरे परम पिता नाराज मत हो तू हमपे इतना ;
हम तो है मिट्टी के लोहे, जैसा तू ढालेगा वैसा ही ढल जायेंगे ।
आकार हमें तू ही देता, इनमें जान तू ही फूँकें;
तेरे बिन बेजान है हम जैसे बारिश के बिन ये धरा ।
मैं के शोर में, तन के सुख के लिये तुझसे दूर हो जाते है ।
भाड़े के घर में रहके परम के प्रति अलगान का भाव रखते है ।
किसी भी पल टूट सकता है, मिट्टी का ये घडा ;
पल भर में दुनिया बदल जाती है, फिर पछताने से क्या होता है ।
प्रभु हमारे मन में तू ऐसी ज्योत् जगा दे प्रेम की;
लाख आँधियाँ आवें कामनाओं की, तेरी छाँह में रहने से बुझ न पायें ।


- डॉ.संतोष सिंह