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Hymn No. 171 | Date: 09-Jun-1998
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तेरी निगाहो से होती है अमृत की वर्षा हर पल,
तेरी निगाहो से होती है अमृत की वर्षा हर पल,
तर जाते है हम जैसे कितने पापी पास आके तेरे ।
तू है परम अव्दितीय, हम जैसे कर नहीं सकते तेरा बखान् ।
हम तो है माया के कोठे, फिर भी तू देता हें शरण हमें ।
तू है अबूझ, फिर भी कितना शांत और सूरत हो के रहता है हम सबके बीच
हमने सब कुछ पाया है, फिर इतराते फिरते है तेरे जगत में ।
ऐ मेरे प्यारे खुदा आँसूओं की तुझसे स्याही से लिखा है गीत तेरा,
भटके हुये है हम, पर प्यार सच्चा है तेरे लिये ।
स्वार्थ होगे तुझसे बहुत से हमारे पाने के चक्कर में;
पर उस पाने के चक्कर में हम खोना नहीं चाहते तुझे ।


- डॉ.संतोष सिंह