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Hymn No. 1771 | Date: 23-May-2000
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देने को तैयार है तू बहुत कुछ, लेने से हिचक जाता हूँ।
देने को तैयार है तू बहुत कुछ, लेने से हिचक जाता हूँ।
कैंसे बताऊँ तेरा कहा करने को तैयार रहता है अब मन।
फिर भी मैं न जाने कब कैसे कर जाता हूँ चूक किसी पल।
दल – दल से उबारने के वास्ते तूने क्या न किया अब तक।
अब तो रहना न चाहता हूँ ऊबें, फिर भी डूब जाता हूँ।
क्या खूब व्यवस्था की है तूने, लाभ न ले पाये हम।
प्यार से पिलाया जाम का प्याला, हम ही न जान पाये।
वह की अबूझ अड़चनों को दूर किया तूने अपनी कृपा से।
अरे रे छोड़ो चलने की, हम ही लड़खड़ा गये सरेआम।
फिर भी है विश्वास लगने न दूँगा दामन पे तेरे कोई दाग।


- डॉ.संतोष सिंह