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Hymn No. 1780 | Date: 26-May-2000
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हे ये तोड़ देना चाहता हूँ तेरे वास्ते तन – मन के बंधन को।
हे ये तोड़ देना चाहता हूँ तेरे वास्ते तन – मन के बंधन को।
सारी इच्छाओं का मुख मोड़ देना चाहता हूँ तुझे अपना बनाने के वास्ते।
बिखेर देना चाहता हूँ अपने आपको ओर चारो तेरा सानिध्य पाने के वास्ते।
अमिट या सिमट रहूं किसी भी रूप में जुड़ा रहना चाहता हूँ तेरे संग।
दुनियावी रंग गिरे कितना भी मेरे ऊपर, चढ़े न तेरे प्यार के सिवाय कोई और रंग।
अंग – अंग से फूले तेरे प्यार की महक, बहकने न पाये मेरा मन।
हो रूख कोई भी जीवन का, छू न सके दुःख हमको आता रहे कितना भी।
तलाश में निकला हूँ तेरे, हो जाये चाहे जिंदगी खलाश तेरे पीछे।
कितना भी किस्सा आम हो जाये, नाम हो या बदनाम पाना चाहूँ प्यार तेरा।


- डॉ.संतोष सिंह