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Hymn No. 1795 | Date: 01-Jun-2000
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हम जानते है, जानता है तू सब कुछ हमारे संसार का।
हम जानते है, जानता है तू सब कुछ हमारे संसार का।
पर इक् बात कहता हूँ, तू ना पहचाने हमारे भावों का।
जन्मता है सब कुछ तेरी कृपा से, दाता तू ही तो है संसार में।
फिर भी दिल की तरंगों को जानके अनजान बन जाता है क्यों।
उबरना चाहता हूँ दुनियादारी से क्या उबरनें की चाहना न है सच्ची।
क्याँ न करके हो जाना चाहता हूँ तेरा, फिर क्यों हो जाति है चूक।
माना कमी है हममें बहुत, पर आँखें नम रहती है तेरे वास्ते।
बेंदम होऊँ तो तेरे चरणों में, बदल जाये मेरी सारी फितरतें।
तरसाना क्याँ मेरा झूठ है, कब मिटायेगा तू तरस मेरी।
दिल में जम जाये तेरी छवि, हो कैसा भी रंग – ढंग न हो धूमिल कभी।
- डॉ.संतोष सिंह
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