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Hymn No. 1799 | Date: 04-Jun-2000
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चोर न देखा तुझसा हमने, एक नहीं न जाने कितने दिलों को चुराया है तूने।
चोर न देखा तुझसा हमने, एक नहीं न जाने कितने दिलों को चुराया है तूने।
हम तो न सीख सके निभाना एक से, कैसे निभाये तू अनेकों से।
बहुत कुछ जानना है तुझसे, पहले – पहल अपना बनाके दिल में बसाना है तुझको।
अंदाज न था हमको तेरे प्यार का, छीन लिया हमको हमसे अपना प्यार बरसाके।
फिर भी न जाने क्यों तरसे दिल, कुछ और, कुछ और मांग रहाँ है तुझसे।
आनंन्दातिरेक हूँ तेरे साये तले, भला – बुरा भुलाके मौंज में हूँ हर पल।
लूटाना भी भाता है अब हमको, तेरा छलना डुबा जाता है हमको सुखद ख्वाबों में।
तेरे आँखों में आँखें डालके कहता हूँ, तेरे प्यार के आगें न रहा अब कुछ।
अंदेशा न था अपनी दशा का, लोग – बाग की बातों पे न धरता हूँ कानं।
बन गया है तू मेरा जान, मान न मान मैं हो गया हूँ यार तेरा प्यार।


- डॉ.संतोष सिंह