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Hymn No. 176 | Date: 14-Jun-1998
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पल दो पल तूझे याद करते है, फिर ये कहते है की तू क्यों नही नजर आता,
पल दो पल तूझे याद करते है, फिर ये कहते है की तू क्यों नही नजर आता,
होश खुद का रखते है खुद को नहीं भूला पाते, मजबुर हो जाने पे तूझे याद करते है ।
जीते है मरते है हर पल अपने गम में और फिर तुझमें रम जाने का दिखावा करते है ;
अपने भूत से उबर नहीं पाते, भविष्य की सुखद कल्पनाओं के चक्कर में वर्तमान में जी नहीं पाते ।
पाने और पाने के चक्कर में हर पल यूँ ही अपने आपको उलझाते रहते है
दिखावा छोडके अपने आपको तेरे संग जोड के जीना चाहते हुये जी नहीं पाते है।
खुद को इतना कमजोर बना चुके, तुझसे खुदाई मदद की आस रखते है;
माँगते हैं हमेशा कुछ देना नहीं चाहते, अपने आपको तेरे सहारे छोडना नहीं चाहते ।
खुद को तुझसे जोडके सुख – दुख में भी बेफिक्र हो के यूँ ही रहने से डरते है;
तेरी शरण में है हम, तू हमे इन दलदलों से जब चाहे तब उबार सकता है ।


- डॉ.संतोष सिंह