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Hymn No. 177 | Date: 07-Jun-1998
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मेरे परम् पिता तूझे पुकारता फिर रहा हूँ
मेरे परम् पिता तूझे पुकारता फिर रहा हूँ
तेरी छवि में खुदको भुलाता जा रहा हूँ ।
हर दिन एक डग तेरे दर के करीब होता जा रहा हूँ;
तुझे यूँ ही हर पल चाहता रहता हूँ ।
अब कोई काम नहीं है मेरे बस का, यूँ ही डूब जाता हूँ तुझमें ;
तेरा ख्याल जब तक आता है, तब तक श्वास चलती हुई लगती है मेरी ।
मन को तेरे सिवाय् अब कुछ लुभाता नहीं है,
बड़े मे बड़ा सुख तेरे बिना मन को उबाता है
दुख भी आनंद देता है, जब रहता हूँ तेरी मौज में,
कभी – कभी तूझे खोजने की जरूरत नहीं रहती, तू रहता है इतना करीब।


- डॉ.संतोष सिंह