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Hymn No. 1804 | Date: 08-Jun-2000
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सुबह हो या साँझ याद आये दिल को मेरे प्रियतम की।
सुबह हो या साँझ याद आये दिल को मेरे प्रियतम की।
विरह हर पल बढाती जाये दिल में प्यार भरी पीड़ा।
रंचमात्र का मिलता नहीं चैन, कर जाते है बेचैन सावन।
झरने लगते है नयनों से नीर, बरसें बरखा उमड़ घुमड़ के दिल में।
रोके – रूकता नहीं मेरे, याद आते और बह के बहने लग जाते।
सच – पूछो तो चलता नहीं जोर, विवश होता हूँ दिल के आगे।
नीति कूछं और कहती है, पर प्यार सुनता नहीं कुछ मेरा।
जीते जी बन गया हूँ हँसी का पात्र मैं, जो न किया कुछ ठीक से अब तक।
समझे तू चाहे जो कुछ, पर मनाता हूँ मौज हर पल तेरी कृपा से।
तेरे प्यार में घिरा रहता है रोम – रोम मेरा, जैसे बरखा में सूरज बादलों से।


- डॉ.संतोष सिंह