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Hymn No. 1806 | Date: 10-Jun-2000
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प्रेम कि बाते टाल सकता है कैसे तू, रह ना सकते बिना सुनाये हम।
प्रेम कि बाते टाल सकता है कैसे तू, रह ना सकते बिना सुनाये हम।
अंत नहीं होता इक् बार, जो कि शुरूआत गुजर जाये सदियाँ पलों में।
ये दौर गुजारे नहीं गुजरता, इसमें तो डूब जाता है दिल।
बुराईयाँ भी बनके उभरती है खुबियाँ, सम्भाले नहीं सम्भलता दिल।
खिला – खिला रहता है हर पल मन, खोये हुये प्यार में अपने।
इक् अजीब सी छायी रहती है उदासी, होके सब कुछ पास रहता हूँ गुमशुम।
नम आँखो बरस पड़ती है यारों को देखते ही, लगता है खोया हुआ कल मिल गया।
बेजान से तन में आ जात है जान, जब कराती है नजरें प्रेम रस का पान।
भटकता हुआ ध्यान भी जाता है अटक, जब लगाते है नाम रस में गोता।
सारी तलाश मिटके जाती हैं सिमट, जग जात है दिल में जो आस मिलाप की।
- डॉ.संतोष सिंह
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