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Hymn No. 1811 | Date: 15-Jun-2000
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दिल कहता है कुछ गाके सुनाऊँ हाले मोहब्बत का।
दिल कहता है कुछ गाके सुनाऊँ हाले मोहब्बत का।
बया करना हो जाता है मुश्किल, ढूंढे मिलता नहीं शब्द।
होता हूँ खफा अपने आप पे, चाहते हुये क्यों नहीं कर पाता हूँ।
सच पूछों तो बहुत तड़पता हूँ, तड़प – तड़पके हो जाता है शांत मन।
जैसे बरखा के बादर उमड़ - धुमड़के बिन बरसे चले जाये कभी कभार।
भावों अनेको – नेक है मेरे दिल में, पर ढाल नहीं पाते शब्दों में।
देखके मेरा हॉल रह लेता है कैसे चुपचाप तू, क्यों नहीं सुनाता कोई ख्याल।
ऐसा तो हो नहीं सकता कि न जानता हो तू मेरा हॉल।


- डॉ.संतोष सिंह